अपराध का अस्तित्व नकार देने से अपराध समाप्त नहीं हो जाते !
बिहार मुख्यमंत्री का जिम्मेदार पद पर गैर-जिम्मेदाराना बयान
▪️अभिषेक बटवाल, मन्दसौर
किसी भी प्रदेश का मुख्यमंत्री केवल अपने राज्य का राजनीतिक नेतृत्व नहीं करता, बल्कि वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन की जवाबदेही, कानून के राज और नागरिकों की सुरक्षा का प्रतीक होता है। ऐसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा यह कहना कि “हमारे यहाँ कोई अपराध नहीं हैं, अपराध का कॉन्सेप्ट ही खत्म हो चुका है। बिहार में क्राइम हो सकता है, पर अपराध नहीं, कोई अपराधी नहीं” निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है।
मैं बिहार का निवासी नहीं हूँ, लेकिन एक सजग नागरिक होने के नाते यह सवाल उठाना जरूरी समझता हूँ कि आखिर सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के पदों पर बैठे लोग किस तरह की भाषा और सोच का परिचय दे रहे हैं? क्या अपराध की परिभाषा को शब्दों के खेल में उलझाकर उसकी वास्तविकता से मुंह मोड़ा जा सकता है? क्या किसी मुख्यमंत्री के कह देने मात्र से हत्या, बलात्कार, लूट, अपहरण और अन्य आपराधिक घटनाओं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है?
लोकतंत्र में सरकारों से अपेक्षा होती है कि वे अपराधों को स्वीकार करें, कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाएं और पीड़ितों को न्याय दिलाएं। न कि ऐसे बयान दें, जिनसे अपराध के शिकार लोगों की पीड़ा और उनके न्याय के संघर्ष का उपहास होता प्रतीत हो।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसे वक्तव्य केवल एक राज्य की छवि का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में संवैधानिक पदों की गरिमा और राजनीतिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करते हैं।
अपराधमुक्त समाज की कल्पना करना अच्छी बात है, लेकिन अपराधों के अस्तित्व को ही नकार देना शासन की उपलब्धि नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का एक गैर-जिम्मेदाराना तरीका है।
देश के किसी भी प्रदेश का मुख्यमंत्री हो, उससे अपेक्षा यही है कि वह शब्दों से नहीं, अपने कार्यों से अपराधमुक्त व्यवस्था का विश्वास पैदा करे।

