शराब के कारोबार का सिंडिकेट अब कानून को कुचलने लगा है !
खातेगांव की घटना केवल एक पुलिस अधिकारी की मौत नहीं, मध्यप्रदेश की व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।
▪️अभिषेक बटवाल, मन्दसौर.
बबूल बोया है तो कांटे ही मिलेंगे, फल नहीं! यह कहावत आज मध्यप्रदेश की आबकारी व्यवस्था और कानून-व्यवस्था के मौजूदा हालात पर बेहद सटीक बैठती है।
देवास जिले के खातेगांव में थाना प्रभारी दिलीप पुरी की अवैध शराब तस्करी से जुड़े संदिग्ध ट्रक द्वारा कुचले जाने से हुई मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। एक पुलिस अधिकारी, जो अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए अवैध शराब के कारोबार को रोकने निकले थे, उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के चेहरे पर लगा गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसके संरक्षण और नियंत्रण में कानून का राज कायम रहना चाहिए।
सवाल यह है कि आखिर अवैध शराब का कारोबार इतना दुस्साहसी कैसे हो गया कि अब उसे रोकने वाली वर्दी भी सुरक्षित नहीं रही?
मध्यप्रदेश में अवैध शराब का कारोबार कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। समय-समय पर जहरीली शराब से मौतें, तस्करी के मामले और आबकारी अपराधों की खबरें सामने आती रही हैं। देवास जिले में हाल के दिनों में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद भी यह घटना सामने आना बताता है कि समस्या कितनी गंभीर है।
जब शराब के कारोबार में ठेकेदारी, परिवहन, अवैध बिक्री और कथित संरक्षण के नेटवर्क पर सवाल उठते हैं, तब केवल छोटे तस्करों और वाहन चालकों पर कार्रवाई करके जिम्मेदारी पूरी नहीं की जा सकती। यह जांचना आवश्यक है कि इस पूरे कारोबार के पीछे कौन लोग हैं, अवैध शराब कहां से आती है, किन रास्तों से गुजरती है, किनके संरक्षण में चलती है और किन स्तरों पर इसे रोकने में लापरवाही या मिलीभगत होती है।
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि कहीं वैध शराब ठेकेदारी और अवैध शराब के कारोबार के बीच कोई संगठित गठजोड़ तो नहीं पनप रहा है। शासन, आबकारी विभाग, पुलिस और शराब कारोबार से जुड़े प्रभावशाली लोगों के बीच संभावित सांठगांठ के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी दोषी को केवल इसलिए बचने का अवसर नहीं मिलना चाहिए कि उसके पास राजनीतिक, आर्थिक या प्रशासनिक प्रभाव है।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब अपराधियों को यह विश्वास हो जाए कि वे कानून से बड़े हैं और कानून लागू करने वाले अधिकारी भी उनके सामने असहाय हैं।
खातेगांव की घटना शासन और प्रशासन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। यदि अवैध शराब के कारोबार को समय रहते कठोरता से नहीं रोका गया, यदि आबकारी व्यवस्था में व्याप्त संभावित अनियमितताओं और संरक्षण तंत्र की जड़ तक जांच नहीं हुई, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और भयावह रूप ले सकती हैं।
अब आवश्यकता केवल आरोपी चालक की गिरफ्तारी या कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई की नहीं है। आवश्यकता है पूरे नेटवर्क को बेनकाब करने की। शराब के परिवहन से लेकर उसके वितरण और आर्थिक लेन-देन तक की कड़ियों को जोड़कर जांच हो। संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की भूमिका की पड़ताल हो और दोष सिद्ध होने पर किसी भी स्तर के व्यक्ति को बख्शा न जाए।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अवैध कारोबार के विरुद्ध कार्रवाई करने वाले पुलिस और आबकारी अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा, संसाधन और संस्थागत संरक्षण मिले। कर्तव्य निभाने वाले अधिकारी यदि अपनी जान की सुरक्षा को लेकर आशंकित रहेंगे, तो कानून का प्रभावी क्रियान्वयन कैसे होगा?
दिलीप पुरी की मौत को महज एक आपराधिक घटना मानकर फाइलों में बंद कर देना सबसे बड़ी भूल होगी।
उनकी मृत्यु व्यवस्था से जवाब मांग रही है। यह जवाब केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता को चाहिए।
आज प्रश्न यह नहीं है कि एक ट्रक ने एक पुलिस अधिकारी को कुचल दिया। असली प्रश्न यह है कि क्या मध्यप्रदेश में शराब का अवैध कारोबार इतना ताकतवर हो गया है कि कानून को ही कुचलने का दुस्साहस करने लगा है?
याद रखिए, जब व्यवस्था अपराध के बीज बोती है, अपराधियों को फलने-फूलने का अवसर देती है और समय रहते उन्हें नहीं रोकती, तब एक दिन वही अपराध व्यवस्था के लिए कांटे बन जाते हैं।
अब भी नहीं चेते तो अगली खबर किसी और दिलीप पुरी की हो सकती है।
यह समय शोक व्यक्त करने के साथ-साथ व्यवस्था को जगाने का भी है।

