IPC Section 20: जानिए क्या कहती है आईपीसी की धारा 20


भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) भारत का ऑफिशियल क्रिमिनल कोड है। यह एक विस्तृत कोड है जिसका उद्देश्य आपराधिक कानून के सभी मूल पहलुओं को शामिल करना है। इस कोड को 1833 के चार्टर अधिनियम के तहत स्थापित भारत के पहले कानून आयोग की सिफारिशों पर तैयार किया गया था। यह 1862 के शुरूआती ब्रिटिश काल के दौरान ब्रिटिश भारत में लागू हुआ था।

हालांकि, यह उन रियासतों में स्वचालित रूप से लागू नहीं हुआ, जिनकी 1940 के दशक तक अपनी अदालतें और कानूनी प्रणालियां थीं। तब से कोड में कई बार संशोधन किया गया है और अब अन्य आपराधिक प्रावधानों के साथ यह कार्य कर रहा है।

इस एक्ट का उद्देश्य है भारत के लिए एक सामान्य दंड संहिता प्रदान करना। हालांकि यह पहला उद्देश्य नहीं है, यह अधिनियम भारत में लागू होने के समय लागू होने वाले दंड कानूनों को निरस्त नहीं करता है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि संहिता में सभी अपराध शामिल नहीं हैं और यह संभव था कि कुछ अपराध अभी भी संहिता से बाहर रह गए हों, जिनका इरादा दंडात्मक परिणामों से छूट देने का नहीं था। यद्यपि यह संहिता इस विषय पर पूरे कानून को शामिल करता है।

1860 की भारतीय दंड संहिता (IPC) को 23 अध्यायों (Chapters) में बांटा गया है जिसमें मूलत: 511 धाराएँ (Sections) शामिल हैं। यह कोड सबसे पहले एक इंट्रोडक्शन के साथ शुरू होता है उसके बाद इसमें मौजूद स्पष्टीकरण और अपवाद प्रदान करता है और अपराधों की एक विस्तृत श्रृंखला को शामिल करता है।

क्या है आईपीसी की धारा 20?

भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 20 कोर्ट ऑफ जस्टिस के विषय में जानकारी देता है। ‘ न्यायालय ‘ शब्द एक ऐसे न्यायाधीश के विषय में बताता है जिसे कानून द्वार एक निकाय के रूप में न्यायिक रूप से कार्य करने के लिए सशक्त किया गया है या यह शब्द दर्शाता है जिसे अकेले न्यायिक रूप से कार्य करने के लिए कानून द्वारा सशक्त किया गया है, या न्यायाधीशों की एक बॉडी जो कानून द्वारा एक निकाय के रूप में न्यायिक रूप से कार्य करने के लिए सशक्त है, जब ऐसा न्यायाधीश या न्यायाधीशों की बॉडी न्यायिक रूप से कार्य कर रहा है। उदाहरण के लिए मद्रास कोड के 22 रेगुलेशन VII, 1816 के तहत काम करने वाली एक पंचायत, जिसके पास मुकदमों को देखने और निर्धारित करने की शक्ति है, एक कोर्ट ऑफ जस्टिस है।

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