रूस, ईरान, उत्‍तर कोरिया… अमेरिका विरोधी देशों का बन रहा नया गुट, भारत के लिए क्‍यों अग्निपरीक्षा?


Russia-Ukraine Crisis: किसी के दुश्‍मनों को आपस में दोस्‍त बनने में समय नहीं लगता है। यूक्रेन पर हमले (Russia-Ukraine War) के बाद दुनिया की तस्‍वीर तेजी से बदलने वाली है। रूस को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के नेतृत्‍व में पश्चिमी देश उतावले हैं। ये सभी मिलकर रूस को बेशुमार प्रतिबंधों (Sanctions on Russia) से जकड़ देना चाहते हैं। इनमें आर्थिक और राजनयिक प्रतिबंध शामिल हैं। प्रतिबंधों की ऐसी ही मार ईरान, उत्‍तर कोरिया और वेनेजुएला भी झेल रहे हैं। तराजू के एक ही पलड़े में खड़े होने के कारण इन देशों के आपस में संबंध मजबूत हुए हैं। ऊर्जा, तकनीकी से लेकर रक्षा तक ईरान, उत्‍तर कोरिया और वेनेजुएला एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। रूस को अलग-थलग करने की अमेरिकी कोशिश दुनिया को साफ तौर पर दो खेमों में बांटती दिख रही है। यहां शायद बीच की गुंजाइश मुश्‍किल होगी। तराजू में किसी एक पलडे़ पर बैठना ही होगा। भारत के लिए आज यही सबसे बड़ा सवाल है।

दुनिया में अमेरिका विरोधी देशों का एक नया धड़ा बन रहा है। रूस शुरू से उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी रहा है। हालांकि, हाल के वर्षों में यह प्रतिद्वंद्व‍िता नफरत में तब्‍दील हुई है। दोनों एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं। अमेरिका विरोधी धड़ों में ईरान, उत्‍तर कोरिया और वेनेजुएला का नाम भी शामिल है। इन देशों पर बेतहाशा प्रतिबंधों से यहां रहने वालों में अमेरिका से चिढ़न बढ़ी है। नतीजा यह हुआ है कि यहां शासकों के हाथ और मजबूत हुए हैं। खास बात यह है कि इनमें से किसी भी देश में फलता-फूलता लोकतंत्र नहीं है। अमेरिका से नफरत इन देशों को पास ला रही है।

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अमेर‍िका व‍िरोधी देशों के र‍िश्‍ते हुए हैं मजबूत
ईरान और उत्‍तर कोरिया रक्षा क्षेत्र में एक-दूसरे का जमकर साथ दे रहे हैं। उत्‍तर कोरिया से ईरान सैन्‍य हथियार खरीद रहा है। ईरान का न्‍यूक्लियर प्रोग्राम भी काफी कुछ उत्‍तर कोरिया पर निर्भर है। वहीं, ईरान उत्‍तर कोरिया की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहा है। ये साइबर सिक्‍योरिटी में भी एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। माना जाता है कि इसके पीछे चीन का भी हाथ है। अमेरिकी प्रतिबंधों की मार ने इनकी प्राथमिकता को साफ कर दिया है। ये किसी तरह की कन्फ्यूजन में नहीं हैं। यही कारण है कि इनकी नजदीकी लगातार बढ़ी है।

वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद उसने भी ईरान और उत्‍तर कोरिया के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को मजबूत किया है। बेशक, अमेरिकी बंदिशों ने वेनेजुएला और ईरान के निर्यात की कमर तोड़ने का काम किया है। लेकिन, ये दोनों अपने-अपने देशों में अमेरिका विरोधी लहर का इस्‍तेमाल कर कारोबार में एक-दूसरे को बढ़ावा दे रहे हैं। इनमें से किसी भी देश को अपने इरादों से पीछे हटने से अमेरिका रोक नहीं पाया है।

यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों से अमेरिका विरोधी देशों का खेमा और मजबूत और ताकतवर होगा। वो खुलकर सामने आएगा। ये बदलते समीकरण दुनिया को दो ध्रुवों में बांटने की ताकत रखते हैं।

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चीन के लिए इतना भी आसान नहीं फैसला
हाल के दिनों में अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर खुलकर सामने आई है। ड्रैगन अब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश को टक्‍कर देने की राह पर है। हालांकि, रूस के साथ अमेरिका विरोधी धड़े के साथ चले जाना उसके लिए इतना आसान नहीं है। कारण है कि चीन एक्‍सपोर्ट बेस्‍ड इकॉनमी है। पूरी दुनिया में सप्‍लाई के लिए उसके कारखाने चलते हैं। ऐसे में उसके साथ जोखिम बहुत ज्‍यादा हैं। यूक्रेन मामले में कूटनीतिक लिहाज से भले वह रूस के संदर्भ में थोड़ा नरम दिख रहा हो, लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ खुलकर बैर लेने के लिए वह इतनी जल्‍दी तैयार नहीं होगा। इसमें उसके आर्थिक हितों को बहुत बड़ा झटका लगेगा।

भारत की अग्निपरीक्षा का समय
भारत के लिए भी स्थिति बहुत नाजुक है। हाल के कुछ वर्षों में यह उसकी कूटनीति की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। उसने पिछले कुछ सालों में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को सुधारने में बहुत ज्‍यादा ऊर्जा खपाई है। इसमें कोई दो राय भी नहीं है कि संबंधों में सुधार भी हुआ है। जिस गर्मजोशी के साथ आज अमेरिका में भारत के प्रधानमंत्री का स्‍वागत होता है, पहले शायद ही कभी हुआ है। वहीं, रूस भारत का सदाबहार दोस्‍त रहा है। वह कठिन से कठिन समय में भारत के साथ रहा है। चुनौती यह है कि भारत किसी एक खेमे में नहीं जाता है तो उसके अलग-थलग पड़ने का खतरा बढ़ जाएगा।

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