रूस पांच दिन के बाद भी यूक्रेन पर कब्जा क्यों नहीं कर पाया? कहां कमजोर पड़ रहे पुतिन?


russia ukraine war analysis: रूस और यूक्रेन में जारी जंग के बीच इस बात का भी विश्लेषण करना जरूरी है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना होने के बावजूद रशिया पांच दिन के बाद भी यूक्रेन पर कब्जा क्यों नहीं कर पाया?.. और दुनियाभर में हथियार बेचने वाले रशिया के अपने Tanks, Rockets और Fighter Jets, इस युद्ध में नाकाम क्यों हो रहे हैं? यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध में रशिया को उस तरह की सफलता हासिल नहीं हुई, जिसकी उसे उम्मीद थी. और इसका एक बड़ा कारण ये है कि युद्ध, हथियारों और सेनाओं से नहीं जीते जाते. रशिया के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है, रशिया दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु शक्ति है, रशिया के पास 8 लाख सक्रिय सैनिकों की फौज है. लेकिन इसके बावजूद रशिया की सेना पिछले पांच दिन से यूक्रेन में संघर्ष कर रही है. और ऐसा इसलिए है क्योंकि युद्ध सेना और हथियारों से नहीं बल्कि हौसले और जज़्बे से जीता जाता है.

इन देशों के सैनिकों के पास साहस नहीं 

इसे आप अमेरिका के उदाहरण से समझ सकते हैं. पिछले 100 वर्षों में अमेरिका ने कई युद्ध लड़े. कई देशों में अपनी सेनाएं भेजीं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1945 से 1990 तक सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लम्बा शीत युद्ध लड़ा. कोरिया, वियतनाम, इराक, अफ़ग़ानिस्तान और खाड़ी देशों में कट्टरपंथी ताक़तों के ख़िलाफ़ कई वर्षों तक संघर्ष किया. केवल इन पांच लड़ाइयों पर ही उसने 328 लाख करोड़ रुपये ख़र्च किए. ये भारत की कुल अर्थव्यवस्था से दोगुना है, जो लगभग 190 लाख करोड़ रुपये है. लेकिन इन सभी युद्धों और संघर्षों में अमेरिका की सेना को कामयाबी नहीं मिली. यानी ये जो बड़े-बड़े देश हैं, ये दुनिया को डराते तो हैं कि हमारे पास सबसे विशाल सेना है, ख़तरनाक हथियार हैं और लड़ाकू विमान है. लेकिन सच ये है कि युद्ध सिर्फ़ सैनिकों और हथियारों से नहीं लड़े जाते है. युद्ध साहस और जज़्बे से लड़े जाते हैं. और फिर चाहे अमेरिका हो, रशिया हो या फिर चीन, इन देशों के पास बड़ी-बड़ी सेनाएं तो हैं, लेकिन इन देशों के सैनिकों के पास साहस नहीं है.

रूस के हथियार यूक्रेन के खिलाफ नाकाम क्यों?

आज रशिया पूरी दुनिया में अमेरिका के बाद हथियार बेचने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है. पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा 37 प्रतिशत हथियार अमेरिका द्वारा बेचे जाते हैं. इसके बाद 20 प्रतिशत रशिया, लगभग 8 प्रतिशत फ्रांस, साढ़े पांच प्रतिशत जर्मनी और चीन लगभग पांच प्रतिशत हथियार दुनिया को बेचता है. इनमें यूक्रेन लगभग 3 प्रतिशत ग्लोबल शेयर के साथ 12वें स्थान पर है. रशिया के पास ना सिर्फ़ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी विशाल सेना है बल्कि वो दूसरे देशों की हथियारों की ज़रूरत को पूरा करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश भी है. लेकिन इसके बावजूद आज रशिया के आधुनिक Tanks, हेलिकॉप्टर, Fighter Jets और रॉकेट यूक्रेन में नाकाम हो रहे हैं.

रशिया के लगभग 5300 सैनिक मारे जा चुके!

रशिया की सेना ने खारकीव में कई ख़तरनाक रॉकेट दागे थे, लेकिन इनमें से ज्यादातर रॉकेट में कोई विस्फोट ही नहीं हुआ. यानी जैसे दीवाली पर आप बाज़ार से ये सोच कर महंगे पटाखे लाते हैं कि वो तेज़ धमाका करेंगे, लेकिन वो फुस्स हो जाते हैं. ठीक ऐसा ही खारकीव में रशिया के साथ हुआ. यूक्रेन की Border Guards का दावा है कि रशिया के आधुनिक Tanks और हेलिकॉप्टर भी उसका ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं. यूक्रेन ने बताया है कि वो अब तक रशिया के 29 Fighter Jets और Helicopter, 191 Tanks, 816 बख्तरबंद गाड़ियां और दो युद्धपोत को नष्ट कर चुका है. इसके अलावा दावा है कि इस युद्ध में रशिया के लगभग 5300 सैनिक मारे जा चुके हैं.

यूक्रेन में फेल हो रहे रशिया के फाइटर जेट

अब रशिया दुनिया में 60 से ज़्यादा देशों को सीधे तौर पर हथियार बेचता है, जिनमें भारत भी है. इसलिए इन देशों में अब ये बेचैनी है कि अगर भविष्य में उन्हें युद्ध लड़ना पड़ा और उन्होंने रशिया के दिए यही हथियार इस्तेमाल किए तो क्या उनका हाल भी ऐसा ही होगा? उदाहरण के लिए, यूक्रेन ने रशिया के सुखोई-25 लड़ाकू विमानों को मार गिराने का दावा किया है. ये Fighter Jet, युद्ध के समय सबसे आगे रहने वाले सैनिकों को Air Support देता है. इसे सोवियत संघ ने बनाया था और रशिया दावा करता है कि उसके यहां निर्मित ये Fighter Jet, इस श्रेणी का सबसे ख़तरनाक लड़ाकू विमान है. लेकिन सच्चाई ये है कि, यूक्रेन में ये विमान, बुरी तरह फेल हो रहे हैं. और इस बात ने दुनिया के उन 30 देशों की चिंता बढ़ा दी है, जिन्होंने रशिया से ये लड़ाकू विमान खरीदे हैं. इस युद्ध में यूक्रेन ने रशिया के Attack Helicopter मार गिराने का भी दावा किया है. और इनमें Kamov KA-52 नाम के हेलिकॉप्टर भी हैं, जिन्हें रशिया सबसे आधुनिक और सबसे ख़तरनाक हेलिकॉप्टर बताता है. और पिछले कुछ समय से चीन रशिया से इन अटैक Helicopters को ख़रीदने की डील करना चाह रहा है. लेकिन अब इन तस्वीरों को देखने के बाद शायद चीन अपना विचार बदल दे और रशिया के इन Helicopters पर दांव ना लगाए.

रशिया की सेना ने 1991 के बाद नहीं लड़ा बड़ा युद्ध

हालांकि यहां हम स्पष्ट कर दें कि ये सारी जानकारी पश्चिमी मीडिया द्वारा दुनिया में प्रसारित की जा रही है. और पश्चिमी मीडिया रशिया के ख़िलाफ़ ही एकतरफ़ा रिपोर्टिंग कर रहा है. और ये बता रहा है कि रशिया के हथियार काम नहीं कर रहे है. लेकिन हो सकता है कि ये बात पूरी तरह सही नहीं हो. दूसरी बात, रशिया ने यूक्रेन में अभी अपनी पूरी सेना नहीं उतारी है. रशिया के पास 8 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिक हैं. लेकिन उसने एक से डेढ़ लाख सैनिक ही यूक्रेन में भेजे हैं. इनमें भी केवल 30 हज़ार ही युद्ध क्षेत्र में मौजूद हैं. हालांकि यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध में रशिया की स्थिति अभी वैसी नहीं है, जैसा कि वो सोच रहा था. और इसका एक बड़ा कारण ये है कि, रशिया की सेना ने वर्ष 1991 में हुए सोवियत संघ के विघटन के बाद कभी कोई बड़ा युद्ध लड़ा ही नहीं है. उसने जॉर्जिया, चेचन्या और क्राइमिया जैसे देशों और क्षेत्रों में छोटी-छोटी लड़ाइयां तो लड़ी लेकिन इन्हें युद्ध कहने से ज्यादा सैन्य संघर्ष कहना सही होगा. क्योंकि इनमें रशिया की सेना अपनी क्षमता की दो प्रतिशत ताकत का भी इस्तेमाल नहीं कर पाई थी. यानी आप कह सकते हैं कि सोवियत संघ के विघटन के बाद जब से रशिया की सेना अस्तित्व में आई है, तब से उसने कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा है और उसकी सेना और उसके हथियार Out of Practice चल रहे हैं. रशिया की तरह, यही स्थिति चीन जैसे देशों की भी है, क्योंकि इन देशों ने भी कई दशकों से कोई युद्ध नहीं लड़ा है. जबकि भारत की सेना इनके मुकाबले मानसिक रूप से काफ़ी मजबूत है. भारत ने अपना आख़िरी युद्ध 1999 में कारगिल में लड़ा था. जबकि चीन ने अपना आख़िरी युद्ध वर्ष 1979 में वियतनाम में लड़ा था. और रशिया ने अपना आख़िरी युद्ध अफगानिस्तान में 1980 से 1989 के बीच लड़ा था.

रशिया के Tanks को भी काफी नुकसान

यूक्रेन के कुछ इलाक़ों से ऐसे Videos भी आए हैं, जिन्हें देख कर पता चलता है कि इस युद्ध में रशिया के Tanks को भी काफ़ी नुक़सान पहुंचा है. पूरी दुनिया में रशिया अपने Combat Tanks को सबसे ख़तरनाक बताता है. लेकिन सच ये है कि यूक्रेन की सेना ताकत में कमज़ोर होते हुए इन Tanks को आसानी से निशाना बना रही है और इन Tanks को नष्ट करना उसके लिए ज्यादा मुश्किल काम साबित नहीं हो रहा है. Drones के ज़रिए यूक्रेन की सेना ने एक साथ रशिया के कई Tanks को नष्ट करने का दावा किया. अब सवाल है कि यूक्रेन की सेना ताकत में कमज़ोर होते हुए भी रशिया के आधुनिक Tanks को इतनी आसानी से कैसे नुकसान पहुंचा पा रही है? तो इसका जवाब ये है कि वर्ष 2014 में जब रशिया ने क्राइमिया को अपने नियंत्रण में लिया था. तभी से पश्चिमी देश और अमेरिका मुफ्त में यूक्रेन को आधुनिक हथियारों की सप्लाई कर रहे हैं. इनमें Anti Air Craft Drones, Anti Tank Drones और Javeline Missile प्रमुख हैं. Javeline Missile वो मिसाइल होती हैं, जिन्हें एक अकेला सैनिक अपने कंधे पर रख कर भी लॉन्च कर सकता है और किसी भी Tank को उड़ा सकता है.

एक मिसाइल की कीमत लगभग 61 लाख रुपये

इस एक मिसाइल की कीमत लगभग 61 लाख रुपये है. और अमेरिका अब तक ऐसी 600 Missiles यूक्रेन को मुफ्त में दे चुका है. सोचिए, अमेरिका ये मिसाइल दुनिया के बहुत कम देशों को देता है. लेकिन यूक्रेन को उसने ये मुफ्त में दे दी. इससे पता चलता है कि अमेरिका का मकसद क्या है.. अमेरिका ने यूक्रेन को Stinger Missiles भी दी हैं. और ये एक ऐसी मिसाइल है, जो युद्ध के नतीजों को पूरी तरह बदल सकती है. वर्ष 1985 से 1988 के बीच जब सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान में मुजाहिद्दीन संगठनों के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रही थी, उस समय अमेरिका ने इन मुजाहिद्दीन संगठनों को यही Stinger Missiles दी थीं, जिन्हें आतंकवादी अपने कंधे पर रख कर इन्हें कहीं से भी लॉन्च कर सकते थे और उन्होंने रशिया के कई Tanks को उस समय नुकसान पहुंचाया था.

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