यूक्रेन-रूस टकराव में भारत: क्या रंग लाएगा नपा-तुला रुख



यूक्रेन संकट पर भारत राजनयिक स्तरीय वार्ता और शांति बहाली की बात कर रहा है।

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के अब तक के रुख को नपातुला और सधे अंदाज वाला बताया जा रहा है। खासकर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अब तक दो दफा मतदान में भारत विरत रहा। इसे राजनयिक अंदाज में संतुलन साधने की कोशिश मानी जा रही है। दरअसल, इस युद्ध को रूस, अमेरिका, चीन और तमाम यूरोपीय देशों के साथ भारत के संबंधों की कसौटी भी माना जा रहा है। आर्थिक मोर्चे पर शेयर बाजार में गिरावट से चुनौतियां बढ़ने के संकेत हैं। रक्षा सौदों के मामले में भारत के रूस और अमेरिका- दोनों के साथ गहरे संबंध हैं। चिकित्सा की पढ़ाई को लेकर यूक्रेन भारतीय छात्रों के लिए पसंदीदा जगह रही है। युद्ध से भारत का आयात-निर्यात भी काफी हद तक प्रभावित हो रहा है।

भारत-अमेरिका संबंध

यूक्रेन संकट के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति की एक टिप्पणी से राजनयिक स्तर पर शिकन बढ़ी है। रूसी हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन जब वाइट हाउस में पत्रकारों से बात कर रहे थे, तब एक सवाल पर उन्होंने टिप्पणी कर दी कि रूस के साथ रक्षा संबंधों को लेकर भारत के साथ उनके मतभेद अभी सुलझे नहीं हैं और उन पर बातचीत चल रही है। रूस के साथ भारत के रक्षा सौदों, खासकर एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली को लेकर उनसे सवाल पूछा गया था। अपने जवाब में बाइडेन ने कम शब्दों में इशारा कर दिया कि अमेरिका भारत के रुख से ज्यादा संतुष्ट नहीं है।

दरअसल, यूक्रेन संकट पर भारत राजनयिक स्तरीय वार्ता और शांति बहाली की बात कर रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर के मुताबिक, यूक्रेन के मुद्दे पर जो कुछ हो रहा है, वह नाटो के विस्तार और सोवियत-युग के बाद रूस के पश्चिमी देशों के संबंधों से जुड़ा है। सुरक्षा परिषद में भारत ने जिस तरह के बयान दिए, उसे रूस के पक्ष में माना गया। रूस ने भारत के इस रुख का स्वागत किया है।

भारत-रूस रिश्ता

भारत की रूस के साथ करीबी अमेरिका को परेशान करती रही है। बीते साल दिसंबर में पुतिन ने भारत का दौरा किया था, जिसमें दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौतों पर दस्तखत किए गए थे। उसके बाद भारत ने पुष्टि की कि रूस ने जमीन से हवा में मार करने वाली एस-400 मिसाइलों की आपूर्ति शुरू कर दी है। एस-400 मिसाइलों की आपूर्ति को भारतीय सेना को आधुनिक बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। वर्ष 2018 में हुआ यह समझौता पांच अरब डालर से भी ज्यादा का है, लेकिन इस पर अमेरिका की नाराजगी की तलवार अब भी लटक रही है।

अमेरिका ने ‘काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ (काट्सा) नामक कानून के तहत इस समझौते को आपत्तिजनक माना है। काट्सा के तहत रूस को उत्तर कोरिया और ईरान के साथ उन देशों की सूची में रखा गया है, जिन्हें अमेरिका ने अपना शत्रु बताया है। इसकी वजह यूक्रेन में रूस की कार्रवाई, 2016 के अमेरिकी चुनावों में दखल अंदाजी और सीरिया की मदद जैसी रूसी गतिविधियां बताई गई हैं।

रूस पर भारत की निर्भरता

भारत, कश्मीर मामले में पाकिस्तान के साथ विवाद में रूस के सहयोग और सुरक्षा परिषद में वीटो के लिए निर्भर रहा है। यूक्रेन से विवाद के दौरान जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान मास्को पहुंचे तो भारत ने चौकस निगाह रखी। इमरान खान से पुतिन की मुलाकात करीब तीन घंटे चली। राजनयिक स्तर पर माना जा रहा है कि यूक्रेन की जंग से भारत के लिए ना सिर्फ कश्मीर बल्कि चीन के साथ भी चल रहे विवाद में नई चुनौतियां पैदा हुई हैं। पाकिस्तान और चीन दोनों रूस की तरफ है। ऐसे में सुरक्षा परिषद में मतदान से भारत के बाहर रहने को बेहतर विकल्प माना जा रहा है।

भारत और रूस ने 2025 तक आपसी कारोबार को 30 अरब डालर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। भारत रूस के तेल और गैस पर भी बहुत निर्भर है। रूस से प्राकृतिक गैस के कुल निर्यात का 0.2 फीसद भारत को जाता है। भारत-रूस ने सैन्य तकनीक में सहयोग को अगले दशक तक बढ़ाने के लिए करार पर दस्तखत किए थे। रक्षा और ऊर्जा संसाधनों के अलावा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बड़े सहयोग के लिए करार किया गया है।गगनयान मिशन के तहत तीन भारतीयों को 2022 तक अंतरिक्ष में भेजने की योजना है, जिसके लिए सरकार 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर रही है। जंग की वजह अब गगनयान मिशन पर भी असर पड़ने की आशंका है।

रूस और यूक्रेन से कारोबारी संबंध

रूस और भारत के बीच अब कारोबार काफी कम रह गया है। भारत अपने कुल सामान का 0.8 फीसद रूस को निर्यात करता है। भारत के कुल आयात में रूस का हिस्सा महज 1.5 फीसद है। वर्ष 2020 में भारत और रूस के बीच बिजनेस संबंधों में 17 फीसद की गिरावट आई है। दूसरी ओर, भारत और यूक्रेन के बीच भी बहुत ज्यादा कारोबार नहीं है। भारत केवल बड़े पैमाने पर खाद्य तेल यूक्रेन से आयात करता है। पिछले साल भारत के कुल खाद्य तेल आयात में 74 फीसद हिस्सेदारी यूक्रेन की थी। इसके अलावा प्लास्टिक और पालिमर का आयात- निर्यात भी बड़े पैमाने पर होता है। यूक्रेन में कई बड़ी भारतीय कंपनियां- जैसे रैनबैक्सी, डाक्टर रेड्डी लैब और सन ग्रुप का कारोबार है।

क्या कहते हैं जानकार

देश में हथियार बनने लगे हैं, इसके बावजूद भारत अब भी रूसी हथियारों पर बहुत निर्भर है। बड़ी सच्चाई यह है कि भारत एक तरह से चीन के साथ युद्ध के बीच में है। विवादित सीमा को लेकर भारत और चीन आमने सामने है। यह ध्यान में रखना होगा।

  • सी राजामोहन, रक्षा विशेषज्ञ

भारत में रूस से पेट्रो आयात बहुत कम है और इसे अन्य बाजारों से बदला जा सकता है। स्पष्ट है कि यूक्रेन और रूस के बीच जंग का कुछ ज्यादा असर भारत पर नहीं पड़ने वाला है।

  • अजय सहाय, महानिदेशक, फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गनाइजेशन

.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published.