Petrol-Diesel की कीमतों में जल्द आएगा उछाल, Russia Ukraine War नहीं बल्कि यह होगी वजह


नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतें साल 2014 के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंची हैं। रूस और यूक्रेन की लड़ाई (Russia Ukraine War) से कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल आने की आशंका है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों (Petrol Diesel Price) पर पड़ता है। क्रूड ऑयल के वैश्विक भाव में उतार-चढ़ाव के साथ सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी फेरबदल करती हैं। पिछले साल दिवाली के बाद से क्रूड ऑयल की कीमतों में तो भारी उछाल आ चुका है, लेकिन पेट्रोल-डीजल के भाव में कोई फर्क नहीं आया है। पिछले साल दिवाली पर केद्र सरकार ने पेट्रोल पर सीमा शुल्क (Excise Duty) में 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की सौगात जनता को दी थी।

123वें दिन या 126वें दिन बढ़ेंगी कीमतें?
तीन वर्षों में यह पहली बार था, जब सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स (Tax on Petrol Diesel) कम करके जनता को राहत दी। वास्तव में, पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) शुरू होने वाले थे। यही कारण है कि पिछली दिवाली से अब तक सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। इस तरह करीब 100 दिनों से कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। अब बाजार के जानकारों और राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर शर्त लगा रहे हैं कि कीमतें 123वें दिन से बढ़ना शुरू होगी या 126वें दिन से। जो 123 वां दिन है वह सात मार्च को पड़ता है, यह पांच राज्यों में चुनाव की आखिरी तारीख है। वहीं, 126वां दिन 10 मार्च को पड़ रहा है, इस दिन चुनाव परिणाम (Election Results) जारी होंगे। अब आप समझ गए होंगे की कीमतों को स्थिर बनाए रखने के पीछे आर्थिक कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक कारण है।
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जब सरकार ने बढ़ाया था टैक्स..
पिछले साल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी के पीछे बड़ा कारण क्रूड ऑयल की कीमतों में अत्यधिक बढ़ोत्तरी नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से टैक्स में गई बढ़ोत्तरी थी। पिछले साल फरवरी से मई के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर सीमा शुल्क को क्रमश: 13 रुपये प्रति लीटर और 16 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया था। साथ ही राज्य सरकारों ने भी टैक्स बढ़ाया था। यही कारण था कि पिछले दो वर्षों में क्रूड ऑयल में 20 फीसद की बढ़ोत्तरी होने पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें 45 फीसद बढ़ गई हैं।

सरकार की टाइमिंग देखिए..
जनता को राहत देने के लिए टैक्स घटाने की सरकार की टाइमिंग हम देखें, तो आपको चुनावी कारण जरूर नजर आएगा। पिछली दिवाली से पहले साल 2018 में सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स घटाया था। उस समय बढ़ती तेल की कीमतें छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और मिजोरम के चुनावों के साथ ही आगे आने वाले केंद्र के चुनावों के लिए भी एक बड़ा खतरा थीं। उस समय सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर सीमा शुल्क को 1.5 रुपये प्रति लीटर घटाया था और तेल कंपनियों से कीमत में एक रुपया प्रति लीटर कम करने के लिए कहा था।

कटौती कम बढ़ोत्तरी ज्यादा
अगर हम अक्टूबर 2017 से नवंबर 2021 तक के आंकड़े देखें, तो सीमा शुल्क में बढ़ोत्तरी कटौती की तुलना में अधिक बार हुई हैं और बड़ी भी हैं। टैक्स में कटौती ही नहीं, बल्कि तेल की कीमतों को स्थिर रखना भी एक ही कहानी बयां कर रही है। तकनीकी रूप से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें सरकार द्वारा नहीं, बल्कि ऑयल मार्केटिंग कंपनीज द्वारा तय की जाती हैं, लेकिन चुनावों से पहले नियमों को तोड़ दिया जाता है।

वास्तविक लागत और खुदरा कीमतों में आ गया है बड़ा अंतर
चार नवंबर को सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स घटाया था। उस समय पेट्रोल की कीमत 103.97 रुपये प्रति लीटर व डीजल की कीमत 86.67 रुपये प्रति लीटर पर थी। इसके बाद दो दिसंबर को दिल्ली सरकार ने भी पेट्रोल पर टैक्स में कमी थी। इससे पेट्रोल की कीमत 95.41 रुपये प्रति लीटर पर आ गई। उस समय क्रूड ऑयल का भाव 69.52 डॉलर प्रति बैरल के करीब था। तब से लेकर अब तक पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। लेकिन क्रूड ऑयल की कीमत 93.61 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंची है। इस तरह पेट्रोल और डीजल की वास्तविक लागत और खुदरा कीमतों में बड़ा अंतर आ गया है और यह अंतर बढ़ता जा रहा है। Ballpark के अनुसार, क्रूड ऑयल में प्रत्येक एक डॉलर की बढ़ोत्तरी खुदरा कीमतें में 70 से 80 पैसे की बढ़ोत्तरी करती है। इसका मतलब है कि पेट्रोल और डीजल में सात से आठ रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। इतनी बड़ी बढ़ोत्तरी एक साथ नहीं की जा सकती। इसका मतलब है कि ग्राहकों को धीरे-धीरे पेट्रोल डीजल की कीमतें ऊपर चढ़ती हुई दिखाई देंगी।

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अगर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें अगले महीने से बढ़ना शुरू होती हैं, जैसा कि कई लोंगो को उम्मीद है, तो शुरुआती दिनों में होने वाली बढ़ोत्तरी यूक्रेन संकट के कारण नहीं होगी, बल्कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों द्वारा कीमतों को रिकवर करने के चलते होगी।

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