लालू का शहाबुद्दीन से रहा गलबहियां राजनीति वाला रिश्ता, डॉन के कुनबे से RJD ने तोड़ा सियासी संबंध, जानें पूरा मामला


पटना : बिहार के सियासी गलियारों में आज भी लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) और बाहुबली शहाबुद्दीन के राजनीतिक रिश्ते की चर्चा होती रहती है। शहाबुद्दीन (Mohammad Shahabuddin) बाहुबली होने के साथ बिहार के सबसे कद्दावर नेता लालू यादव के बेहद खास भी रहे। भले बिहार के सियासी जानकार हमेशा ये कहते रहे कि शहाबुद्दीन से लालू का राजनीतिक समझौते वाला रिश्ता रहा। इसमें संबंधों के दौरान पैदा होने वाली भावनात्मक और संवेदनात्मक लगाव वाली कोई बात नहीं थी। शहाबुद्दीन राजनीति की रपटीली राहों में लगे वो पत्थर रहे, जिन्हें सियासत ने अपने वक्त के हिसाब से इस्तेमाल कर लिया। ऊपर कही गई बातें हाल में हुए सियासी घटनाक्रम के आईने में देखी जा सकती हैं। शहाबुद्दीन की कोरोना की वजह से तिहाड़ जेल में मौत हो गई। राजद की ओर से प्रतिक्रिया ठंडी रही। उधर, शहाबुद्दीन के समर्थकों में राजद नेताओं के प्रति उबाल होता रहा।

राजद रही खामोश
जब राजद को इस बात का एहसास हुआ कि अल्पसंख्यक समुदाय में कहीं विपरित संदेश न चला जाए। उसके बाद पार्टी की ओर से डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू हुई और लालू के बड़बोले बेटे तेज प्रताप सिवान पहुंच गए। हालांकि, सियासी जानकारों की मानें, तो तेज प्रताप का सिवान पहुंचना शहाबुद्दीन के परिवार को एक रस्म अदायगी लगी। शहाबुद्दीन के समर्थक लालू यादव के पहुंचने का इंतजार कर रहे थे। लालू नहीं, तो कम से कम तेजस्वी (Tejashwi Yadav) के आगमन का उन्हें इंतजार था। खैर, बात आई-गई हो गई। जब गोपालगंज विधानसभा उपचुनाव की गहमागहमी शुरू हुई, तो कयास लगाये गए कि शहाबुद्दीन का कुनाब एक्टिव होगा। ऐसा नहीं हुआ शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब (Hena Shahab) और बेटे पूरी तरह खामोश रहे।

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गोपालगंज चुनाव का असर !
गोपालगंज में ओवैसी की पार्टी ने महागठबंधन में सेंध लगा दी। राजद के हाथ से गोपालगंज सीट निकल गई। यहां भी बात आई-गई हो गई। राजद को फिर भी शहाबुद्दीन और उनके परिवार की याद नहीं आई। सियासी जानकार मानते हैं कि शहाबुद्दीन लालू यादव को अपना मेंटर मानते थे। इसके पीछे कारण ये था कि जिस वक्त लालू यादव ने बीजेपी नेता आडवाणी की रथ यात्रा रोक कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उसी दौरान शहाबुद्दीन राजनीति में एंट्री ले रहे थे। लालू के एक्शन ने उन्हें काफी प्रभावित किया था। शहाबुद्दीन बाद में लालू यादव के सबसे चहेते नेताओं में से एक रहे। लेकिन, उनके निधन के बाद तेजस्वी वाली राजद ने शहाबुद्दीन के परिवार पर ध्यान नहीं दिया।

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‘लालू परिवार ने रिश्ता तोड़ा’
बिहार की राजनीति को जानने वाले कहते हैं कि लालू परिवार की ओर से शहाबुद्दीन के कुनबे को लगातार किनारे करने की कोशिश हुई। इसमें सबसे बड़ी भूमिका तेजस्वी यादव और उनके सलाहकारों की रही। तेज प्रताप और लालू यादव यदि शहाबुद्दीन के परिवार से संबंध रखना भी चाहते थे, लेकिन तेजस्वी का तेवर देखकर उन्होंने कदम पीछे खींच लिये। शहाबुद्दीन के परिवार से सियासी रिश्ता खत्म होने का प्रमाण देते हुए जानकार कहते हैं कि आप लालू की ताजा घोषणा देख लीजिए। सिंगापुर रवाना होने से पहले लालू यादव ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों की सूची को अंतिम रूप दिया। 81 सदस्यों वाली इस कार्यकारिणी में शहाबुद्दीन के कुनबे से किसी को शामिल नहीं किया गया।

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राजद ने किया किनारा
जानकारों ने यहां तक कहा कि पिछली बार जब ये सूची तैयार हो रही थी। उसमें राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अलावा पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड में शहाबुद्दीन की पत्नी का नाम शामिल था। इस बार किसी सूची में बाहुबली के परिवार के सदस्यों का नाम नहीं है। हालांकि, कई लोग इसे गोपालगंज चुनाव के रिजल्ट से जोड़कर देखते हैं। वहीं कईयों का मानना है कि गोपालगंज चुनाव में शहाबुद्दीन फैक्टर ने कोई काम नहीं किया। यहां, सीधे ओवैसी के प्रत्याशी ने वोट काट लिये। इसके लिए शहाबुद्दीन के परिवार की तरफ देखना सही नहीं है। शहाबुद्दीन के परिवार को दरकिनार किये जाने से सिवान सहित गोपालगंज का अल्पसंख्यक समाज लालू परिवार के प्रति गुस्से में है। इधर, बिहार में महागठबंधन की सरकार बन जाने के बाद शहाबुद्दीन के परिवार के लिए जेडीयू के अंदर जाने का रास्ता भी बंद है। जानकार एक ही संभावना जताते हैं कि आने वाले दिनों में हिना शहाब ओवैसी की पार्टी की तरफ रूख करेंगी।

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