जानिए, यूक्रेन-रशिया के बीच युद्ध हो क्यों रहा है? रूस के आगे कैसे बेबस हो गई दुनिया


Russia-Ukraine War: रूस ने यूक्रेन के ऊपर हमला कर दिया है. दोनों के बीच जोरदार जंग जारी है. आपको ये समझना चाहिए कि आखिर ये युद्ध क्यों हो रहा है?

ये पूरा विवाद इस बात को लेकर है कि यूक्रेन NATO देशों का सदस्य बनेगा या नहीं? 

2008 में की नाटो ज्वाइन करने की कोशिश 

– वर्ष 2008 में NATO देशों ने ये निर्णय लिया था कि वो यूक्रेन को अपने सैन्य संगठन में शामिल करने पर विचार कर सकते हैं. तब इसके लिए एक समिति का भी गठन किया गया था. उस समय रशिया की तरफ़ से यूक्रेन पर इतना दबाव बनाया गया कि उसे इस समझौते से पीछे हटना पड़ा और तब ये डील नहीं हो पाई. 

तभी से यूक्रेन अलग अलग समय पर NATO देशों को Join करने के प्रयास करता रहा है. उसने एक ऐसी ही कोशिश वर्ष 2021 में अंत में की थी, जिस पर रशिया ने कड़ा ऐतराज जताया था. रशिया को ये मंज़ूर नहीं है कि उसका पड़ोसी देश, NATO देशों में शामिल हो जाए, जो उसे अपना दुश्मन मानता है.

NATO अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देशों का एक मिलिट्री ग्रुप है. अब रशिया के सामने चुनौती ये है कि उसके कुछ पड़ोसी देश, पहले ही NATO को Join कर चुके हैं. इनमें Estonia (एस्टोनिया) और Latvia (लातविया) जैसे देश भी हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे. अब अगर यूक्रेन भी NATO का मित्र देश बन गया तो रशिया चारों तरफ़ से अपने दुश्मन देशों से घिर जाएगा और उस पर अमेरिका जैसे देश हावी हो जाएंगे.

रूस करता है यूक्रेन की कोशिश का विरोध

NATO देश इस सिद्धांत को मानते हैं कि अगर उनके किसी मित्र देश पर कोई दूसरा राष्ट्र हमला करता है तो ये हमला सभी NATO देशों पर माना जाएगा और ये सारे देश, उस राष्ट्र के ख़िलाफ़ मिल कर लड़ेंगे. यानी अगर यूक्रेन NATO का सदस्य होता तो इन देशों को अपनी सेनाएं यूक्रेन में भेजनी ही पड़ती. रशिया इसी वजह से यूक्रेन के NATO देशों के साथ जाने का विरोध करता है.

रशिया की क्रान्ति के नायक, व्लादिमीर लेनिन ने एक बार कहा था कि रशिया के लिए यूक्रेन को गंवाना ठीक वैसा ही होगा, जैसे एक शरीर से उसका सिर अलग हो जाए. हालांकि आपके मन में ये सवाल भी होगा कि यूक्रेन NATO के साथ क्यों जाना चाहता है?

इसे समझने के लिए आपको इतिहास में 100 साल पीछे जाना होगा. वर्ष 1917 से पहले तक रशिया और यूक्रेन, Russian Empire यानी रूसी साम्राज्य का हिस्सा हुआ करते थे. लेकिन 1917 में रशिया की क्रान्ति के बाद, ये साम्राज्य बिखर गया और यूक्रेन ने खुद को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया. हालांकि यूक्रेन मुश्किल से तीन साल भी आज़ाद नहीं रहा और वर्ष 1920 में ये सोवियत संघ में शामिल हो गया.

वर्ष 1991 में हुआ ता सोवियत संघ का विघटन

वर्ष 1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ, तब 15 नए देश बने थे, जिनमें यूक्रेन भी था. यानी असल मायनों में यूक्रेन को वर्ष 1991 में आज़ादी मिली. यूक्रेन शुरुआत से इस बात को समझता है कि वो कभी भी अपने दम पर रशिया का मुकाबला नहीं कर सकता. इसीलिए वो एक ऐसे सैन्य संगठन में शामिल होना चाहता है, जो उसकी स्वतंत्रता को हर स्थिति में सुनिश्चित करे.

NATO से अच्छा विकल्प उसके लिए हो नहीं सकता था. एक लाइन में कहें तो विवाद ये है कि यूक्रेन, रशिया के दबाव से बाहर निकलने के लिए NATO देशों के साथ जाना चाहता है और रशिया को लगता है कि अगर उसका पड़ोसी देश, NATO के साथ चला गया तो इससे अमेरिका की सेना उसकी सीमा तक पहुंच जाएगी, जो उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरनाक होगा.

इस युद्ध की जड़ में एक और बड़ा कारण ये है कि रशिया के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बिना युद्ध लड़े ही पूर्वी यूक्रेन के तीन टुकड़े कर दिए हैं. जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है. पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन में रशिया की सीमा पर स्थित Donetsk (दोनियस्क) और Luhansk (लुहांस्क) नाम के दो क्षेत्रों को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी है. जहां वर्ष 2014 से ही रशिया समर्थित संगठनों का नियंत्रण था. इस समय भी इन दोनों क्षेत्रों में रशिया ने अपनी शांति सेना तैनात की हुई है. आप कह सकते हैं कि अब ये दोनों क्षेत्र, रशिया द्वारा ही नियंत्रित किए जा रहे हैं.

संकट में छिपी हैं क्या 3 सीख

इस संकट में क्या सीखी छीपी हैं, ये भी आज आपको समझना चाहिए. पहली सीख ये है कि अगर कोई देश कमज़ोर हो तो अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियों का भी कोई महत्व नहीं रहता.

हमने आपको पहले भी बताया था कि वर्ष 1994 में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रशिया के बीच Hungary के Budapest में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसे Budapest Memorandum भी कहा जाता है. इस संधि के तहत इन देशों ने भरोसा दिया था कि वो टकराव की किसी भी परिस्थिति में यूक्रेन के हितों की सुरक्षा करेंगे और ये सुनिश्चित करेंगे कि यूक्रेन एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में कार्य करता रहे. आज इसी संधि पर हस्ताक्षर करने वाले एक देश, रशिया ने यूक्रेन पर हमला कर दिया है और दूसरी तरफ़ अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन, यूक्रेन की कोई मदद नहीं कर पा रहे हैं.

दूसरी सीख ये है कि जो देश अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं होते, उस देश की रक्षा करने कोई नहीं आता.

दुनिया में शक्ति के केन्द्रीयकरण और संतुलन के लिए अलग अलग सैन्य और राजनीति संगठन मौजूद हैं. आज संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं हैं, G-20 और G-7 जैसे संगठन हैं, SAARC, BRICS, NATO और Shanghai Cooperation Organisation यानी SCO जैसे संगठन भी इस दुनिया में हैं, जो ये कहते हैं कि वो संकट की स्थिति में सहयोग के साथ समाधान पर काम करेंगे. लेकिन सच ये है कि इन संगठनों का आज कोई महत्व नहीं है.

अगर कोई देश अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं है तो वो इन संगठनों का सदस्य देश होकर भी कुछ हासिल नहीं कर सकता है.

तीसरी सीख ये है कि, जिस देश के आंतरिक मामलों में दूसरे देशों का दख़ल होता है, उस देश में अनिश्चितता और अस्थिरता पैदा होना सम्भाविक है. ये हम अफगानिस्तान में भी देख सकते हैं और अब यूक्रेन में भी ऐसा ही हो रहा है.

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यूक्रेन को बचाने नहीं आए पश्चिमी देश

यूक्रेन और रशिया के बीच युद्ध को टालने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों ने काफ़ी दबाव बनाया लेकिन उनकी कोई कोशिश काम नहीं आई. रशिया इसलिए इन देशों पर 21 साबित हुआ, क्योंकि उसने अपने आंतरिक फैसलों को अपने हाथ में रखा. उसने किसी और देश के हिसाब से ये तय नहीं किया कि उसे अब क्या करना चाहिए.

प्राचीन भारतीय दर्शन में मत्स्य न्याय सिद्धांत का उल्लेख किया गया है, जो ये कहता है कि अराजकता की अवधि में, जब कोई शासक नहीं होता, तब शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर व्यक्ति को नष्ट कर देता है, ठीक वैसे ही जैसे सूखा पड़ने पर बड़ी मछलियां, छोटी मछलियों को खा जाती है. इसी तरह एक शासक या एक देश, संघर्ष को अपना सहारा बना कर कमज़ोर व्यक्ति और छोटे देशों को निगल जाते हैं और आज यही हो रहा है.

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