Chernobyl Disaster in Hindi: क्या थी चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना, रूसी हमले के बाद जिसको दोहराने का डर जता रहा यूक्रेन, जानें सबकुछ


मॉस्को: रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia Ukraine War News) के बीच चेरनोबिल शहर एक बार फिर चर्चा में है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने दावा किया है कि रूसी सेना चेरनोबिल (Russian Army in Chernobyl) में घुस चुकी है। उन्होंने यह भी बताया है कि रूसी सैनिक चेरनोबिल न्यूक्लियर प्लांट पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। इस दौरान हुई गोलीबारी में न्यूक्लियर वेस्ट स्टोरेज फैसिलिटी को नुकसान पहुंचने की बात की जा रही है। जेलेंस्की ने कहा है कि उनके देश की सेना चेरनोबिल जैसे दूसरे हादसे (Chernobyl Disaster) को रोकने के लिए जी-जान लगाकर युद्ध कर रही है। वहीं, रूसी रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर बताया है कि उनकी सेना के हवाई हमले में यूक्रेन के 74 मिलिट्री बेस को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा डोनबास में एक यूक्रेनी अटैक हेलीकॉप्टर को मार गिराया गया है।

36 साल पहले हुआ था भयानक हादसा
दरअसल, आज से 36 साल पहले 26 अप्रैल 1986 को तत्कालीन सोवियत संघ के चेरनोबिल के न्यूक्लियर पावर प्लांट में विनाशकारी धमाका हुआ था। इस हादसे की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धमाके के चंद घंटे में प्लांट में काम करने वाले 32 कर्मचारियों की मौत हो गई। इसके अलावा सैकड़ों कर्मचारी न्यूक्लियर रेडिएशन की वजह से बुरी तरह से जल गए। शुरू में तो सोवियत संघ ने इस हादसे को छिपाने की पूरी कोशिश की। मीडिया कवरेज से लेकर लोगों की आवाजाही को तुरंत रोक दिया गया था। लेकिन, स्वीडन की एक सरकारी रिपोर्ट के बाद तत्कालीन सोवियत संघ ने इस हादसे को स्वीकार कर लिया था। विभाजन के बाद चेरनोबिल शहर यूक्रेन के हिस्से में आ गया।

कीव से 130 किमी दूर है चेरनोबिल
चेरनोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट यूक्रेन की राजधानी कीव से करीब 130 किलोमीटर उत्तर में प्रिपयेट शहर में स्थित था। यह जगह बेलारूस की सीमा से करीब 20 किलोमीटर दक्षिण में है। इस न्यूक्लियर पावर प्लांट में चार रिएक्टर बने हुए थे। यूनिट 1 का निर्माण 1970 में जबकि यूनिट 2 का निर्माण 1977 में हुआ था। 1983 में यूनिट नंबर 3 और 4 का काम पूरा हुआ था। इस हादसे के समय दो रिएक्टर एक्टिव थे। इस रिएक्टर को ठंडा रखने के लिए पास से बह रही प्रिपयेट नदी के किनारे एक कृत्रिम झील का निर्माण किया गया था। इस झील से पानी को पाइप के सहारे रिएक्टर तक लाया जाता था। बाद में उन्हें इस्तेमाल कर वापस इसी झील में भेज दिया जाता था।

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क्यों हुई थी चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना
26 अप्रैल को दुर्घटना वाले दिन न्यूक्लियर पावर प्लांट में एक टेस्ट किया जाना था। इस दौरान वैज्ञानिक यह जांच करना चाहते थे कि क्या बिजली सप्लाई बंद होने की स्थित में रिएक्टर के बाकी उपकरण काम करते हैं कि नहीं। वो यह भी पता लगाना चाहते थे कि इस स्थिति में न्यूक्लियर टरबाइन कितनी देर तक घूमते रहेंगे और बिजली सप्लाई को बनाए रखेंगे। इस बिजली की मदद से रिएक्टर को ठंडा रखने वाले कूलिंग पंपों की बिजली सप्लाई की वास्तविकता का भी अध्ययन किया जाना था।

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25 अप्रैल की रात हुई थी हादसे की शुरुआत
25 अप्रैल की रात करीब 1.30 बजे टरबाइन को कंट्रोल करने वाले वॉल्ब को हटा दिया गया। उसके बाद रिऐक्टर को आपातकालीन स्थिति में ठंडा रखने वाले सिस्टम को भी बंद कर दिया गया। रिऐक्टर में एक ऑटोमेटिक स्विच लगा होता है जो किसी तरह की आपातकालीन स्थिति में नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया को रोक देता है। वैज्ञानिकों ने उस स्विच को भी ऑफ कर दिया। इसके कारण अचानक रिऐक्टर के अंदर नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया बेकाबू हो गई। तेजी से भाप बनने लगा जिससे रिऐक्टर के अंदर दबाव बढ़ गया। इससे थोड़े ही समय के अंदर दो शक्तिशाली विस्फोट हुआ जिससे पूरे वातावरण में रेडियोएक्टिव पदार्थ फैल गया।

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कुल 5000 लोगों कीी मौत का दावा
यह धमाका इतना शक्तिशाली था कि रिऐक्टर को ढकने वाली एक हजार टन से ज्यादा वजन की मेटल प्लेट और उसके ऊपर बनी कंक्रीट की मजबूत छत हवा में उड़ गए। रिऐक्टर में इस्तेमाल होने वाली परमाणु ईंधन की छड़ों के परखच्चे उड़ गए। ये रेडियोएक्टिव छड़ें हवा में काफी ऊंचाई तक उछलीं, जिससे पर्यावरण में रेडियोएक्टिव पदार्थ काफी दूर तक फैल गया। इस रेडिएशन से होने वाले कैंसर से बाद में सोवियत संघ के करीब 5,000 नागरिकों की मौत हो गई थी। लाखों लोगों का स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हुआ था।

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