जानिए सरदार पटेल का बैरिस्टर से लौह पुरूष बनने का सफर


भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) पेशे से एक वकील थे और उनका जन्म 31 अक्टूबर को हुआ था। सरदार पटेल को लौह पुरूष के नाम से भी जाना जाता है लेकिन कोई एक या दो कारण ऐसे नहीं हैं जिसकी वजह से उन्हें लौह पुरुष की संज्ञा दी गई है। बल्कि ऐसे कई ऐसे आवाश्यक कार्य हैं जिसे सरदार पटेल ने बिना किसी हिंसा के अपने विवेक के आधार पर अंजाम दिया। सरदार पटेल ना केवल अपना मत रखना जानते थे बल्कि वे दूसरे के मतों का भी उतना ही सम्मान करते थे। सरदार पटेल गांधी के विचारों से बड़े प्रभावित थे और उनके असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर जीवन भर खादी पहनने का निर्णय लिया था।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की लिस्ट में पहुंचे और साथ ही भारत छोड़ो आंदोलन को बढ़ावा देते हुए भी 1934 और 1937 के चुनावों में पार्टी को संभालने का कार्य किया। सरदार पटेल महिलाओं की आजादी और उनकी आत्मनिर्भरता के मुखर समर्थक थे।

कैसे बने सरदार?
सरदार पटेल ने 1928 में गुजरात के बरदौली में किसानों के साथ मिलकर आंदोलन किया जिसका लक्ष्य था बढ़ते हुए कर को नियंत्रित करना। सरदार पटेल इस आंदोलन में विजयी भी हुए। विजयी होने की खुशी में बरदौली की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि दे दी। उसके बाद से ही वल्लभभाई का पूरा नाम सरदार वल्लभभाई पटेल हो गया।

ऐसे बने लौह पुरूष।
आजादी के समय भारत में लगभग 562 रियासत थी जिसने देश के 48% क्षेत्र को कवर किया था और यह इसकी आबादी का 28% हिस्सा था। जबकि ये राज्य कानूनी रूप से ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थे, बल्कि वे पूरी तरह से ब्रिटिश क्राउन के अधीन थे। सरदार पटेल कि लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इन रियासतों को भारत में मिलाना और पटेल ने इसके लिए बेहद मश्क्कत भी की। सरदार पटेल के अथक प्रयासों का भुगतान तब हुआ जब ज्यादातर शासक अपने-अपने राज्यों के विघटन के लिए सहमत हो गए।

हजारों गांवों, जागीरों, महलों, संस्थानों, करोड़ों की नकद शेष राशि और लगभग 12,000 मील की रेलवे प्रणाली का कंट्रोल भारत सरकार को सौंप दिया गया। 15 अगस्त, 1947 तक रियासतों के विलय की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी लेकिन कुछ रियासतों ने भारत के साथ शामिल होने से मना कर दिया। हालांकि, सबसे बड़ी समस्याएं जोधपुर के साथ उठीं, जिसने पाकिस्तान के साथ शामिल होने की मांग रखी तो वहीं हैदराबाद और कश्मीर ने स्वतंत्र रहने का इरादा जताया। लेकिन समय के साथ सभी रियासतों का भारत में विलय हो गया।

राजनैतिक करियर।
सरदार पटेल के राजनैतिक करियर की शुरुआत 1917 से हुई जब उन्होंने महात्मा गांधी से प्रभावित होकर वकालत छोड़ दी और 1917 से 1924 तक अहमदाबाद के पहले भारतीय नगरपालिका आयुक्त के रूप में कार्य किया। इसके बाद वह 1924 से 1928 तक इसके निर्वाचित नगरपालिका अध्यक्ष रहे। पटेल ने पहली बार 1918 में अपनी पहचान बनाई जब उन्होंने गुजरात के किसानों और जमींदारों के जन अभियानों की योजना बनाई। पटेल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1945-46 में पार्टी के लिए अध्यक्ष पद पर प्रमुख उम्मीदवार थे। देश में 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की जंयती को ‘ राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

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