Hockey India की कैप्टन बनी हरियाणा के गांव की छोरी, जानिए सविता पूनिया के संघर्ष की कहानी…


सिरसा. हरियाणा के सिरसा जिले के छोटे से गांव जोधकां के लोगों को आज जश्न मनाने का मौका मिल गया है. ऐसा इसलिए कि गांव की लाड़ली बेटी और ‘द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया’ (The Great Wall of India) के नाम से मशहूर हॉकी प्लेयर सविता पूनिया (Savita Poonia) को हॉकी इंडिया की कमान दी गई है. टोक्यो ओलिंपिक में आस्ट्रेलिया के खिलाफ 8 पेनल्टी कॉर्नर बचाकर ‘द ग्रेट वॉल’ (The Great Wall) बनी सविता पूनिया को अब भारतीय महिला हॉकी टीम की कमान दी गई है. स्पेन में 26-27 फरवरी को होने वाली अंतर्राष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन (FIH) महिला प्रो हॉकी लीग (Women Pro Hokey League) मैचों के लिए एक बार फिर से महिला हॉकी टीम ने कमर कस ली है. भारतीय महिला टीम इन दिनों में भुवनेश्वर में प्रैक्टिस कर रही है.

आज दुनिया में अपनी चुस्ती फुर्ती के लिए पहचानी जाने वाली सविता पूनिया के लिए यहां तक सफर आसान नहीं रहा है. हम बता रहे हैं सविता पूनिया के संघर्ष की कहानी…

अपने दादा को रोल मॉडल मानने वालीं सविता ने 2003-04 में खेलना शुरू किया था. तब मेरी मां को गठिया की समस्या थी। ऐसे में खेल के दौरान मेरे मन में मां, परिवार की बात चलती रहती थी. मुझे लगता था कि मां को मेरी जरूरत है. मैं यहां खेल रही हूं और वहां मेरा भाई और मेरे पापा घर के काम कर रहे हैं. डेढ़ साल तक तो मैं इसी सोच में रही. इसके बाद सुंदर सर ने पापा से मुझे गोलकीपर बनाने की बात की और उन्होंने मुझे इसी पर फोकस रखने को कहा. मम्मी-पापा भी चाहते थे कि मैं स्पोर्ट्स पर ध्यान लगाऊं.

सविता पूनिया को द ग्रेट वाल ऑफ इंडिया कहा जाता है. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके लिए यहां तक का सफर आसान नहीं रहा है.

शुरुआत करना आसान, लेकिन आगे बढ़ना बेहद मुश्किल

एक इंटरव्यू में सविता पूनिया ने कहा, “मेरा हॉकी का सफर संघर्ष से भरा रहा है। मध्यमवर्गीय परिवार से आने की वजह से हर चीज काफी सोच समझ कर करनी पड़ती थी। हालांकि, मैं इस मामले में खुद को किस्मत वाली मानती हूं कि मुझे अपने परिवार को मनाना नहीं पड़ा. उन्होंने खुद मुझे हॉकी में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. शुरुआत करना तो आसान होता है, कोई न कोई रास्ता तो मिल ही जाता है, लेकिन असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब आप आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं.”

उन्होंने आगे बताया कि “जब मैंने खेलना शुरू किया, तो मैं डिफेंडर थी. करीब डेढ़ साल तक मैंने डिफेंडर के तौर पर टीम में जगह बनाई. इसके बाद मेरे पहले कोच सुंदर सिंह खरब ने पापा से बोला कि इसकी हाइट अच्छी है, इसे गोलकीपर बना सकते हैं। ये आगे जाकर जरूर इंडिया के लिए खेलेगी। यहीं से मेरे गोलकीपर बनने का सफर शुरू हुआ.”

गोलकीपर बन गई, लेकिन किट नहीं थी, पापा ने 18 हजार रुपये की खरीदकर दी

सविता ने बताया कि हम मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं. गोलकीपर बनने का तो ठान लिया, लेकिन उसके लिए किट की जरूरत थी. ग्राउंड पर दो किट थीं, जो पहले से बुक थीं, यानी जो गोलकीपर पहले से प्रैक्टिस कर रहे थे, वे उनका इस्तेमाल कर रहे थे. कोच ने बोला कि अगर ग्राउंड से किट चाहिए, तो एक साल इंतजार करना पड़ेगा. ऐसे में मेरे पापा ने मुझे नई किट लाकर दी. 2003 में उस किट की कीमत 18 हजार रुपये थी और पापा हर महीने सिर्फ नौ हजार रुपये कमाते थे. इसलिए मैं आज जहां भी हूं, उसमें मेरे परिवार का योगदान सबसे ज्यादा है, यही सब सोचकर मैंने तय किया कि अब हॉकी पर ही फोकस करना है.

दादा मेरे रोल मॉडल रहे हैं हमेशा से 

सविता ने बताया कि हॉकी खेलने का फैसला भी अचानक ही किया. इसमें मेरे दादाजी का सबसे बड़ा योगदान रहा। उन्होंने ही मुझसे कहा था कि आप हॉकी ही खेलोगे. सिरसा के स्कूल में तीन खेलों के ट्रायल चल रहे थे- बैडमिंटन, हॉकी और जूडो. मैंने दादाजी को बताया कि कल मैं स्पोर्ट्स के लिए ट्रायल देने जा रही हूं. इस पर उन्होंने पूछा कि कौन-कौन से खेल हैं। मैंने तीनों के नाम बताए, तो उन्होंने कहा कि हॉकी. यहीं से मेरा हॉकी का सफर शुरू हुआ. पर दादाजी ने कहा तो तय कर लिया कि हॉकी ही खेलनी है. बेमन से दिए ट्रायल में हॉकी हाथ आई थी, फिर यही जुनून बन गई.

मैं हमेशा अपने पापा और दादाजी को फॉलो करती रही हूं. पापा मुझे हमेशा दादाजी के उदाहरण दिया करते थे. इसलिए मैं हमेशा उनके नक्शेकदम पर चली. उनके दिखाए रास्ते से ही मैं आज कामयाबी हासिल कर पाई हूं. यह संघर्ष भरा रास्ता जरूर रहा, लेकिन आज मैं जहां पहुंची हूं, वहां पर खुश हूं.

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सविता पूनिया को हाल में भीम अवार्ड देने की घोषणा हुई है, इसके साथ ही वह हॉकी इंडिया का भी नेतृत्व करेंगी.

खेलने के लिए सिरसा से दिल्ली बस से सफर करती थी

मैं हरियाणा से आती हूं. सोचिए उस वक्त हरियाणा की लड़की को हॉकी खेलने के लिए कौन सपोर्ट करेगा और मैं थोड़ी संकोची स्वभाव की थी. सार्वजनिक स्थलों पर असहज महसूस करती थी. उस वक्त इतनी भारी गोलकीपिंग किट के साथ दूर-दूर यात्रा करना कितना मुश्किल होता होगा. सिरसा से दिल्ली जाना होता था. हमारे पास ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं. खुद की गाड़ी भी नहीं थी. बस से सफर करना पड़ता था. कई बार बस ड्राइवर और कंडक्टर किट देखकर डबल किराया मांगते थे. कई बार बस के ऊपर किट रखने को बोलते थे. कमेंट भी करते थे.

जब विरोधी टीम के कोच ने अच्छे खेल पर दिया 100 रुपये का इनाम 

मेरे दादाजी को मुझ पर बहुत गर्व था. मै स्टेट लेवल पर खेल रही थी. शाहाबाद से मेरा मैच था. शाहाबाद काफी अच्छी टीम मानी जाती है. हम अक्सर उनसे बड़े अंतर से हारते थे, लेकिन जब मैंने अपना पहला मैच खेला, तो हमने उन्हें कड़ी टक्कर दी. इसके बाद विरोधी टीम के कोच ने मुझे 100 रुपये इनाम में दिए और बोले कि तुम अच्छा खेली. मैं घर आई और दादाजी को यह बात बताई. वो बहुत खुश हुए.

उन्होंने एक वाकया सुनाते हुए कहा कि 2007 में मेरा चयन नेशनल कैंप के लिए हुआ. इसके एक साल के बाद मुझे नेशनल टीम के लिए चुना गया. मेरा एक आर्टिकल अखबार में छपा था. उसमें मैंने दादाजी के बारे में बताया था तो उन्होंने कहा कि जब भी घर आएगी तेरे सामने ही इसे पढ़कर सुनाऊंगा. मुझे लगा कि दादाजी ऐसे ही बोल रहे होंगे. मैं जब घर आई तो उन्होंने मुझे सामने बैठाकर वो खबर पढ़ी और उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे.

सविता पूनिया को मिलेगा भीम अवार्ड

भारतीय हाकी टीम की कप्तान सविता पूनिया को हरियाणा सरकार की ओर से भीम अवार्ड दिया जाएगा. सविता पूनिया हाल ही में भुवनेश्वर में हाकी लीग मैच खेल रही है. भारतीय हाकी टीम की कमान उनके पास है. इससे पहले उन्हें वर्ष 2018 में अर्जुन अवार्ड मिल चुका है. महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा सविता पूनिया को जिला की ब्रांड एंबेस्डर भी चुना गया है, जिससे सविता दूसरी बेटियां के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है.

गौरतलब है कि भारतीय महिला हाकी टीम में 2006 में शुरुआत करने वाली सविता अभी तक करीब 225 अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकी हैं. सविता एशिया कप राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पांच से छह बार बेस्ट गोल कीपर चुनी जा चुकी हैं, वहीं एशियन गेम्स में ब्रांज मेडल जीत चुकी हैं.

आपके शहर से (सिरसा)

Tags: India Hockey Team, Indian Women Hockey, Savita Poonia

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